आम तौर पर माना ये जाता है कि दिलीप कुमार को फुटबाल से बहुत प्यार था पर सच ये है कि वे क्रिकेट के भी दीवाने थे।

मशहूर बॉलीवुड स्टार और बेमिसाल अभिनेता मोहम्मद यूसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार का जन्म पेशावर में हुआ था। 1930 के दशक में अपने परिवार के साथ रहने मुंबई चले आए थे। इस तरह, जब देश का विभाजन हुआ तो उन्हें चाहने वालों का विभाजन नहीं हुआ और कई ऐसी बातें हैं, जिन्होंने उन्हें दोनों देशों से जोड़े रखा।

आम तौर पर माना ये जाता है कि दिलीप कुमार को फुटबाल से बहुत प्यार था पर सच ये है कि वे क्रिकेट के भी दीवाने थे। यहां तक कि जैसे ही शूटिंग से जरा सी भी फुर्सत मिलती थी तो स्कोर पूछते थे। इन दिनों सोशल मीडिया में एक वीडियो खूब सर्कुलेट हुई मुंबई में ब्रेबोर्न स्टेडियम में खेले गए उस चैरिटी मैच की, जिसमें क्रिकेटर और फिल्म स्टार दोनों खेले थे। इस मैच का एक किस्सा यादगार है।

वैसे तो सलीम दुर्रानी खूब लोकप्रिय थे ही पर उन दिनों में, पर उनकी चर्चा इसलिए ज्यादा थी क्योंकि ‘चरित्र’ नाम की फिल्म में काम कर रहे थे और परवीन बॉबी उनकी हीरोइन थीं, जब ये तेज तर्रार पठान बैटिंग करने आए तो भीड़ में जोश देखने वाला था। अमिताभ बच्चन ने बाएं हाथ से अच्छी धीमी गेंदबाजी की और उन्हें रोके रखा। बेकाबू हो रही भीड़ छक्के के लिए चिल्ला रही थी और दुर्रानी के लिए छक्के लगाना कौन सा मुश्किल काम था? तभी दुर्रानी ने जोश में एक जोरदार शॉट लगा दिया और गेंद बॉउंड्री के ऊपर की ओर जा रही थी। उसी वक़्त मैच के दूसरे पठान यानि कि दिलीप कुमार ने डाइव लगाई और एक हाथ से कैच लपक लिया। स्टेडियम में सन्नाटा छा गया। दुर्रानी चुपचाप लौट आए।

बाद में दिलीप कुमार के खेल को गंभीरता से लेने पर उन्हें अपनी टीम के कप्तान राज कपूर से बातें सुननी पड़ीं, “अरे ये क्या कर डाला. वे सलीम दुर्रानी की बल्लेबाजी देखने आए थे, दिलीप कुमार को कैच लपकते देखने के लिए नहीं!”

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस भारतीय सिनेमा के आइकन दिलीप कुमार को याद किया ख़ासतौर पर इस बात के लिए कि जब इमरान अपनी मां की याद में कैंसर हॉस्पिटल बनाने के लिए वे पैसा जुटा रहे थे तो इस काम में दिलीप कुमार ने भी उनकी बड़ी मदद की थी। इमरान ने कहा, “वह बड़ा मुश्किल वक़्त था पैसे के मामले में. वे मदद के लिए न सिर्फ पाकिस्तान आए, लंदन भी पहुंचे और उनकी मौजूदगी ने बड़ी रकम जुटाने में मदद की.”

पाकिस्तान के क्रिकेटर और बाद में क्रिकेट पत्रकार के तौर मशहूर हुए क़मर अहमद भी उन्हें याद करते हैं। कमर अहमद, जब विभाजन से पहले बिहार में रहते थे तो जो पहली फिल्म देखी वह दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू (1947) थी, इसलिए वे हमेशा दिलीप कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक रहे।

अहमद लंदन में बीबीसी में थे तो भारत में पाकिस्तान की 1979-80 क्रिकेट सीरीज कवर करने उन्हें भेजा गया। उन्हें क्या मालूम था कि अपने मनपसंद स्टार से मिलने का मौका मिल जाएगा? वे दिलीप कुमार से मिले दिल्ली के ताज होटल में पाकिस्तान हाई कमीशन के एक प्रोग्राम में। उनसे दोबारा मिले देव आनंद के घर डिनर पर, जब दिलीप कुमार को पता चला कि वे लंदन से बीबीसी के रिपोर्टर हैं तो दिलीप कुमार ने उन्हें अपनी फिल्म शक्ति की शूटिंग देखने आमंत्रित किया। इस बात को कमर अहमद ने अपनी किताब ‘फ़ार मोर दैन ए गेम’ में भी लिखा है।

उसके बाद राज कपूर के घर एक पार्टी में फिर से मुलाक़ात हो गई। वहां कमर अहमद ने दिलीप कुमार को बताया कि वे उनके बचपन के दोस्त फजल हलीम के अब बहुत अच्छे दोस्त हैं। बचपन के दोस्त फजल हलीम (जो विभाजन के दौरान कानपुर से कराची चले गए थे) का नाम सुनते ही वे बहुत भावुक हो गए।

दिलीप कुमार ने फिर से पूछा कि उनकी फिल्म की शूटिंग के लिए आ रहे हैं न? इतना ही नहीं, अगले दिन दिलीप कुमार ने उनके लिए अपनी एक कार भी भेजी। शक्ति के आखिरी सीन की शूटिंग कर रहे थे उस दिन। शूटिंग के बाद उन्होंने चाय वाले से कहा, ‘देखो, ये पाकिस्तान के मेरे दोस्त हैं। इनके लिए वही स्पेशल चाय लाओ, जो मेरे लिए बनाते हो।’ अभी तो यादों का पिटारा खुलना शुरू हुआ है।

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