एडिलेड में भारत के 36 के स्कोर और शर्मनाक हार के बाद, इस स्कोर के बारे में जितना लिखा गया, संभवतः उतना ही ओपनर पृथ्वी शॉ की दोनों पारी में नाकामयाबी के बारे में लिखा गया। नतीजा – एक ही सुर में बोल रहे हैं क्रिकेट को जानने वाले और न जानने वाले दोनों ही कि पृथ्वी शॉ को टीम से निकालो। ये सोचे बिना कि क्या पृथ्वी शॉ को टीम से निकालने से टीम इंडिया की सब मुश्किलें सुलझ जाएंगी? इस बात की क्या गारंटी है कि पृथ्वी शॉ की जगह जो नया ओपनर बनेगा वह कामयाब रहेगा?

21 साल के पृथ्वी शॉ ने 4 टेस्ट की इस सीरीज से ही टेस्ट क्रिकेट में वापसी की और स्कोर रहे 0 और 4 के। सबसे बड़ी गड़बड़ ये है कि हर कोई उनके बैट के मूवमेंट में तकनीकी कमी बता रहा है, जिससे बैट और पैड के बीच की जगह उनके स्टंप्स की बेल्स उड़ा गई। ये मामला इसलिए और भी ज्यादा चर्चा में रहा, क्योंकि टेस्ट सीरीज से पहले पृथ्वी दोनों प्रैक्टिस मैचों में भी  जूझते रहे और चार पारियों में 0, 19, 40 और 3 के स्कोर बनाए। 

कैसे क्रिकेटर हैं पृथ्वी शॉ? अब तक 5 टेस्ट में 42.4 की औसत से 339 रन। अपने पहले 5 टेस्ट में भारत के :

 – 20 बल्लेबाज़ों ने इससे ज्यादा रन बनाए, जबकि राहुल द्रविड़ ने भी 339 रन ही बनाए। 
–  18 ने उनसे ज्यादा औसत दर्ज़ की। 
–  द्रविड़ और अशोक मांकड़ ने इनमें से सेंचुरी नहीं बनाई थी। 

तो इस तरह से ये रिकॉर्ड तो अभी तक पृथ्वी शॉ को नाकामयाब साबित नहीं करता। अगर भारत से बाहर भी देखें तो रिकॉर्ड है 3 टेस्ट में 17 की औसत से 102 रन और इसी में गड़बड़ है। भारत से बाहर अपने पहले 3 टेस्ट में भारत के :
    
– 3 या इससे कम टेस्ट खेलकर 80 बल्लेबाज़ों ने इससे ज्यादा रन बनाए, जबकि करसन घावरी और यशपाल शर्मा ने भी 102 रन ही बनाए। 

– अब जरा उन कुछ ख़ास नाम पर ध्यान दीजिए, जिन्होंने ऐसे 3 टेस्ट में इससे भी कम रन बनाए : अरुण लाल 100, रविंद्र जडेजा 90, एमएल जयसिम्हा 89, दिलीप वेंगसरकर 83, बी कुन्दरन 78, विराट कोहली 76, लाला अमरनाथ 69, नवजोत सिंह सिद्धू 63, नवाब पटौदी सीनियर 55, पंकज रॉय 54, रवि शास्त्री 48, विक्रम राठोड़ 46, पॉली उमरीगर 43, के श्रीकांत 39 और ब्रजेश पटेल 20 रन। इनमें से कई कामयाब करियर वाले क्रिकेटर बने। तो अकेले पृथ्वी शॉ को ही क्यों दोष दिया जा रहा है?

और फिर पृथ्वी शॉ की जगह किसे खिलाने की बात कर रहे हैं? उन शुभमन गिल को, जो अभी तक एक टेस्ट भी नहीं खेले। शुभमन के टैलेंट से इंकार नहीं है, लेकिन हर कोई सुनील गावस्कर नहीं होता कि भारत से बाहर अपने पहले टेस्ट में ही कामयाब हो जाए और वह भी ऐसे में, जबकि टीम 36 के बाद वापसी कर रही हो। विदेश में पहला टेस्ट खेलने की चुनौती ने कई टेस्ट करियर को झटका दिया है। 

इस समय अगर पृथ्वी शॉ को टीम से बाहर किया जाता है, इसमें सबसे ज्यादा फायदा उनका अपना है। इससे उन्हें अपनी तकनीकी कमी पर काम करने का समय मिलेगा। तकनीकी कमी किसी भी क्रिकेटर के सामने कभी भी आ सकती है। तेंदुलकर, सहवाग और कोहली जैसे क्रिकेटरों को भी करियर के बीच में अपने पहले कोच के पास लौटते देखा है। पृथ्वी शॉ भी ऐसा करेंगे तो टीम इंडिया को इससे फायदा ही होगा। टीम से निकलना इतना जोर देने वाली बात नहीं, जितनी कि पृथ्वी शॉ अपनी सही टैलेंट के साथ खेलें। 

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