क्या सुप्रीम कोर्ट किसी खास व्यक्ति को बचा रहा है या बात कुछ और है?

भारतीय क्रिकेट बोर्ड दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है। अधिक अमीर होने के साथ ही उसे पूरे भारत के जटिल क्रिकेट कार्यक्रमों को आयोजित करना होता है। इसलिए बीसीसीआई के सर्वोच्च पद पर आसीन होने के लिए खेल की भारी समझ और कानूनों की भली-भांति जानकारी होना बेहद जरूरी है। वर्तमान समय में बीसीसीआई के दो सबसे अहम पदों पर पूर्व भारतीय खिलाड़ी सौरव गांगुली और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के पूर्व अधिकारी जय शाह विराजमान हैं। गांगुली भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष हैं, जबकि शाह बीसीसीआई के सचिव हैं।  

पिछले कुछ समय से भारतीय क्रिकेट बोर्ड अपने संविधान में बदलाव करने की जद्दोजहत कर रहा है। 2018 में आरएम लोढ़ा की अगुवाई वाली समिति ने बीसीसीआई में सुधारों की सिफारिश की थी, जिसके तहत बोर्ड में कोई भी अधिकारी लगातार तीन कार्यकाल के लिए पद में आसीन नहीं रह सकता है। इन तीन कार्यकालों में राज्य संघ का कार्यकाल और बीसीसीआई का कार्यकाल शामिल है। इसके बाद पदाधिकारी को तीन साल के कूलिंग पीरियड से गुजरना होगा।

समिति की इस सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। ऐसे में 2016 में पश्चिम बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष और 2019 में भारतीय बोर्ड के अध्यक्ष बने सौरव गांगुली का कार्यकाल 2022 में समाप्त हो जाता। मगर अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में बदलाव करने की अनुमति दे दी है।

बदले हुए नियमों के मुताबिक, अब कोई भी पदाधिकारी लगातार तीन-तीन साल के दो कार्यकाल राज्य संघ और इतनी ही समय अवधि के लिए बीसीसीआई में कार्यभार संभाल सकता है। यानी किसी भी व्यक्ति को कुल 12 वर्षों तक भारतीय क्रिकेट बोर्ड में पद संभालने की छूट मिल गई है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने महज तीन साल में ही अपने फैसले को पलट दिया है, जिसके कारण उनके वर्तमान निर्णय पर काफी सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा लोढ़ा समिति के कूलिंग पीरियड की सिफारिश के पीछे का मुख्य मकसद था कि बोर्ड पर किसी का एकाधिकार ना हो सके। कोर्ट के इस नियम को बदलने से बोर्ड पर एकाधिकार होने की संभावना भी बढ गई है।

सवाल यह भी है कि इस नियम को बदलने में इतनी आनन फानन में सुनवाई क्यों की गई, जबकि कोर्ट में और भी ढेरों अहम केस दबे पड़े हैं। क्या यहां किसी खास व्यक्ति को बचाने के लिए पूरा सिस्टम एकजुट हो गया है या बात कुछ और है। बीसीसीआई के वर्तमान संविधान में ऐसी कोई बड़ी खामी तो नहीं थी, जिसके लिए देश की सर्वोच्च अदालत को अपना कीमती समय इस पर इस्तेमाल करना पड़ा।

हालांकि, बीसीसीआई ने 2019 में ही कोर्ट में याचिका दायर कर दी थी, लेकिन कोरोना के चलते इस केस पर किसी का ध्यान नहीं गया। कोरोना के जाने के बाद बीसीसीआई ने एक बार फिर कोर्ट से अपील की और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने इस मामले पर कुछ ही दिनों में फैसला सुना दिया।

माना, सौरव गांगुली और जय शाह के नेतृत्व में बोर्ड ने भारतीय क्रिकेट का काफी विकास किया है और कमाई भी जमकर की है, लेकिन उनके अलावा भी भारत में कई काबिल अधिकारी हैं, जो बीसीसीआई को सफलता की नई बुलंदियों पर पहुंचा सकते हैं। उनके लिए सिस्टम में इतनी उठा पटक करने की आवश्यकता नहीं थी। 

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