सभी खिलाड़ियों को खेल के तीनों प्रारूपों में खेलना चाहिए।

भारतीय टीम के पूर्व कप्तान दिलीप वेंगसरकर का मानना है कि सभी खिलाड़ियों को खेल के तीनों प्रारूपों में खेलना चाहिए। वेंगसरकर के अनुसार, टेस्ट विशेषज्ञ या सफेद गेंद विशेषज्ञ की अवधारणा गलत है। हाल के सालों में कई खिलाड़ियों ने क्रिकेट के बीजी कार्यक्रमों को देखते हुए एक ही प्रारूप में खेलना शुरू कर दिया है। कोविड-19 के कारण क्रिकेटर्स को कठिन बायो-बबल के नियमों में रहना पड़ रहा है, जिससे चीजें बहुत मुश्किल हो गई हैं।

हालांकि, पूर्व चयनकर्ता ने कहा कि कोई भी क्रिकेटर खेल के केवल एक प्रारूप में विशेषज्ञ के रूप में नहीं जाना जाएगा। दरअसल, हिंदुस्तान टाइम्स के साथ बातचीत के दौरान दिलीप वेंगसरकर से सवाल पूछा गया कि क्या युवा सलामी बल्लेबाज पृथ्वी शॉ को सिर्फ सफेद गेंद के विशेषज्ञ के रूप में देखा जाना चाहिए।

इस पर 65 साल के दाएं हाथ के पूर्व बल्लेबाज ने कहा, “मैं इस रेड-बॉल और व्हाइट-बॉल कॉन्सेप्ट में विश्वास नहीं रखता, जो कुछ भी है आपको बस खेलना है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी रेड-बॉल क्रिकेट में अच्छा है और व्हाइट-बॉल में बुरा है या इसके विपरीत है। हर खिलाड़ी को सभी प्रारूपों में खेलना चाहिए। आप यह नहीं कह सकते हैं कि मैं केवल एक प्रारूप में अच्छा हूं और मैं यही खेलूंगा। कोई भी क्रिकेटर खुद पर मुहर नहीं लगाना चाहेगा कि वे केवल एक ही प्रारूप में अच्छा है।”

वेंगसरकर ने आगे कहा, “इसके अलावा लंबा प्रारूप खेल का अंतिम रूप है। निश्चित रूप से एकदिवसीय और टी20 प्रारूप भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह अहम है कि आईसीसी या बीसीसीआई को यह देखना चाहिए कि लंबा प्रारूप स्वस्थ है।”

उल्लेखनीय है कि पृथ्वी शॉ को टेस्ट प्रारूप में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खराब प्रदर्शन के बाद टीम से बाहर कर दिया गया था। उन्हें श्रीलंका के विरुद्ध खेली जा रही लिमिटेड ओवर्स सीरीज के लिए टीम में शामिल किया गया। दोनों टीम्स के बीच 18 जुलाई से तीन मुकाबलों की एकदिवसीय सीरीज शुरू हुई है, जिसके पहले मैच में शॉ ने 24 गेंदों पर 43 रनों की तूफानी पारी खेली और भारत यह मैच आसानी से सात विकेट से जीत गया।

Leave a comment