deepti dean
नॉन स्ट्राइकर के रन आउट का लॉ बदलता रहा, लेकिन इस तरह आउट का विवाद जारी है!

लॉर्ड्स में चार्ली डीन के रन आउट का विवाद एक बहुत अच्छी सीरीज का विवादास्पद अंत था। इंग्लैंड के पुराने क्रिकेटर चाहे जो कहते रहें, टीम इंडिया की रन आउट की अपील मौजूदा लॉ के हिसाब से थी। अब तो एमसीसी ने भी साफ़ कर दिया है कि अंपायरों का रन आउट का फैसला नॉन स्ट्राइकर के रन आउट के मौजूदा लॉ के हिसाब से था। एमसीसी ने न सिर्फ चार्ली डीन को, दुनिया भर के बल्लेबाजों को हिदायत दी है कि नॉन स्ट्राइकर हैं तो गेंद फेंके जाने तक अपनी क्रीज में रहें।

लॉर्ड्स में उस दिन चार्ली डीन ने गलती ये की कि, इतना अच्छा खेलने के बाद, 44 वें ओवर के बीच में ऑफ स्पिनर दीप्ति शर्मा के डिलीवरी स्ट्राइड में आने पर अपनी क्रीज से बाहर निकल गई। ऐसा नहीं है कि एमसीसी के स्पष्टीकरण के बाद, इस लॉ या घटना पर बहस ख़त्म हो जाएगी, इसके पीछे सबसे बड़ा मुद्दा है ऐसे आउट होने पर तसल्ली न होना या बल्लेबाज का अपनी गलती न मानना।

बल्लेबाज को यही समझाने के लिए, एमसीसी इस लॉ को अलग-अलग तरह से लिखते रहे पर हर घटना का विवाद ये बताता है कि नॉन स्ट्राइकर अगर लॉ को ध्यान में रखें तो विवाद ही न हो। एमसीसी से अब कहा गया कि इस तरह से आउट होना ही रोक दो, एमसीसी ने इस सलाह को मानने से इंकार कर दिया है।

इस तरह से आउट होना, विवाद के साथ चर्चा में आया 1947-48 में जब ऑस्ट्रेलिया टूर के दौरान बेहतरीन भारतीय ऑलराउंडर वीनू मांकड़ ने, नॉन स्ट्राइकर बिल ब्राउन को रन आउट किया। इसी से इस तरह से आउट के साथ उनका नाम जुड़ गया। ब्राउन ने गेंद फेंके जाने से पहले क्रीज से बाहर निकलने की गलती की, चेतावनी के बावजूद, ऐसा करना बंद नहीं किया। मांकड़ ने इस टूर में उन्हें इस तरह से दो बार आउट किया और ज्यादा चर्चा हुई टेस्ट में आउट करने की। याद रहे बाद में, न तो ब्राउन ने कभी शिकायत नहीं की और न ही लॉ बहुत अच्छी तरह से जानने वाले उनके कप्तान डॉन ब्रैडमैन ने।

जहां एक तरफ एमसीसी का मानना है कि इस तरह से आउट के साथ जुड़े भ्रम की वजह से वे इस बारे में लॉ की भाषा बदलते रहे- वहीं सच ये है कि लॉ की भाषा से भ्रम बढ़ता गया। सालों से चले आ रहे लॉ को 2000 में, बदल दिया। अब इसमें लिखा कि डिलीवरी स्ट्राइड में, जैसे ही गेंदबाज का बैक फुट जमीन पर पड़े नॉन स्ट्राइकर अपनी क्रीज से बाहर निकल सकता है। ये संशोधन, फसाद की जड़ है। एमसीसी ने खुद ही, नॉन स्ट्राइकर को अपनी क्रीज से बाहर निकल कर रन चुराने का खुला न्यौता दे दिया। इसने नॉन स्ट्राइकर को अपनी क्रीज छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। अलग-अलग एकेडमी में ये सिखाया जाने लगा कि गेंद फेंके जाने से पहले क्रीज से बाहर कब और कैसे निकलना है। इसीलिए इस तरह से आउट के ज्यादातर विवाद 2000 से बाद के हैं। उससे पहले तो लॉ साफ़ था, गेंद फेंके जाने से पहले क्रीज से बाहर नहीं निकलना है।

तंग आकर और कई विवाद के बाद 2017 में इस लॉ को बदल दिया और अब लिखा कि नॉन स्ट्राइकर, गेंद के लाइव होने के समय से तब तक अपनी क्रीज में ही हो, जब तक कि गेंद रिलीज होने की उम्मीद न हो। अब देखिए- इसमें अंपायर का ‘अंदाजा’ जुड़ गया और होशियार गेंदबाज तो नॉन स्ट्राइकर को गलतफहमी में डाल कर, एक तरह के जाल में फंसाने लग गए। दीप्ति पर भी तो यही आरोप है कि उनका ‘वह’ गेंद फेंकने का कोई इरादा ही नहीं था। वीडियो देखिए- जैसे ही दीप्ति का फ्रंट फुट जमीन पर पड़ा, डीन अपनी क्रीज से थोड़ा बाहर थी। इसमें कोई शक नहीं कि गेंद रिलीज होने पर तो वह और बाहर होती। दीप्ति ने इसे भांप लिया और बेल्स उड़ा दीं। लॉ कहीं नहीं कहता कि चेतावनी दो। चेतावनी की बात स्पिरिट ऑफ़ क्रिकेट में आती है। इसी चेतावनी को प्रथा मान लिया और इसका मतलब अलग-अलग जगह पर अलग-अलग हो गया।

इस साल मार्च में, एमसीसी ने इस लॉ में आउट को ‘अनफेयर प्ले’ से निकाल कर ‘रन-आउट’ बना दिया और यह स्पष्ट भी कर दिया कि कोई चेतावनी नहीं दी जानी चाहिए, क्रीज में रहना जिम्मेदारी है नॉन स्ट्राइकर की। संयोग से, लॉर्ड्स के मैच से कुछ ही घंटे पहले एमसीसी ने इन गाइडलाइन को दोहराया भी था। साथ ही, इस बात पर जोर दिया कि इस तरह से आउट के साथ ‘मांकड़’ न लिखा जाए- ये साफ़ रन आउट है। नए लॉ में गलतफहमी दूर करने की कोशिश तो की पर पुरानी आदत नहीं छूटती।

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