Shardul Thakur
शार्दुल के फैंस उन्हें 'लॉर्ड' के नाम से बुलाते हैं.

एक शुद्ध पेसर की जगह उन शार्दुल ठाकुर को खिलाया ओवल में, जिनके प्रोफाइल में अभी तक ये पक्का नहीं है कि वे गेंदबाज़ हैं, गेंदबाज़- ऑलराउंडर हैं या बल्लेबाज़- ऑलराउंडर? बहरहाल, टीम इंडिया का ये प्रयोग गलत नहीं रहा और ओवल में 57 (36 गेंद में- इसमें 50 सिर्फ 31 गेंद में और टेस्ट क्रिकेट में किसी भी भारतीय के दूसरे सबसे तेज 50) तथा 60 (72 गेंद में) के स्कोर एक नंबर 8 इससे बेहतर और क्या करेगा?

ये भी सच है कि दोनों पारी में उनके रन बड़े काम के साबित हुए। साथ में पहली पारी में एक और दूसरी पारी में दो विकेट और ये दो विकेट वैसे ही थे जैसे सलीम दुर्रानी ने 1971 में पोर्ट ऑफ़ स्पेन में लिए थे। दूसरी पारी में भारत की इंग्लैंड के पहले विकेट की तलाश को आखिरकार शार्दुल ने ही ख़त्म किया और उसके बाद रुट का टॉप विकेट।

अचानक ही ऐसा लग रहा है कि टीम इंडिया की बेहतर संतुलन की तलाश में शार्दुल ठाकुर ‘लाइफ सेविंग’ साबित हुए हैं। हार्दिक पांड्या की टीम को बेताबी से जरूरत थी और ये साफ़ है कि उन्हें टीम में लाने की हर संभव कोशिश भी हुई, बहरहाल फिटनेस ने उनका साथ नहीं दिया। पांड्या का टीम से हटना, शार्दुल का फायदा साबित हुआ और सिर्फ 4 टेस्ट में शार्दुल ने जो कर दिखाया है वह कम से कम ऑलराउंडर के नज़रिए से किसी कमाल से कम नहीं है- 6 पारी में 190 रन 38 की औसत से जिसमें तीन स्कोर 50 वाले और साथ में 14 विकेट 22.71 औसत से। टीम इंडिया की छोटी हो रही बैटिंग लाइन अप को उन्होंने लंबा कर दिया।

जैसी कि आदत है- अभी से उनकी तुलना महान ऑलराउंडर कपिल देव से करने का सिलसिला शुरू हो गया है जो गलत है। यही हार्दिक के वक़्त किया था और सच ये है कि उनका टेस्ट करियर तो इस मुकाम पर भी नहीं पहुंचा कि कपिल देव से तुलना के योग्य बने। इसलिए हाल फिलहाल शार्दुल की किसी से तुलना न करें तो ये शार्दुल के लिए ही अच्छा रहेगा। हाँ, शार्दुल ठाकुर ने ऑलराउंडर की तलाश में बड़ी मदद की है।

ऑस्ट्रेलिया में जो किया वह शानदार था तो ओवल में जीत में भी कमाल की हिस्सेदारी निभाई। ब्रिस्बेन में जीत में सात विकेट और एक स्कोर 50 वाला (115 गेंदों पर 67 रन) – हमेशा ख़ास रहेंगे।

भारत की टीम में 6 पेसर हैं- इशांत शर्मा, जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी, उमेश यादव, ठाकुर और मोहम्मद सिराज। इनकी मौजूदगी में 11 में जगह बनाना कोई साधारण बात नहीं।

भारत के ड्रेसिंग रूम में प्यार से ‘बीफी’ कहे जाने वाले ठाकुर अपनी हरफनमौला टेलेंट से टेस्ट में टीम के ‘गो-टू’ खिलाड़ी बन गए हैं। ये कामयाबी घरेलू सर्किट में कड़ी मेहनत का नतीजा है- मुंबई के लिए बैट और गेंद दोनों के साथ लगातार बेहतर प्रदर्शन किया है। उनकी टेस्ट में बेहतर बल्लेबाज़ी के बारे में बात करते हुए सुनील गावस्कर कहते हैं कि ये उस मन्त्र का नतीजा है जो मुंबई के गेंदबाज़ों को पढ़ाया जाता है- अगर दूसरी टीम का बल्लेबाज़ आपको अपना विकेट आसानी से नहीं देता तो आप अपना विकेट क्यों आसानी से दें? टीम इंडिया को इस सोच का फायदा हुआ है।

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