ipl drs dhoni
जानिए IPL के नियम: डीआरएस के साथ सही फैसला पाने का नियम क्या है?

डीआरएस (डिसीजन रिव्यू सिस्टम) का मतलब है अंपायर के फैसले से अगर संतुष्ट नहीं तो उसका रिव्यू मांगना- ये विकल्प बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों के पास है। सबसे पहले नियम समझते हैं :

आईपीएल में डीआरएस की शुरुआत किस सीजन से हुई : 2018 से।

कितने रिव्यू की इजाजत है : प्रत्येक पारी में, हर टीम को एक ऐसा रिव्यू जो ‘गलत’ निकला। अगर रिव्यू से मूल ऑन-फील्ड अंपायर के फैसले को बदल दिया तो इसे ‘सही’ कहेंगे और इसे रिव्यू की गिनती में नहीं लेंगे।

खिलाड़ी का रिव्यू मांगने का इशारा : T की फिगर बनाना।

रिव्यू की सही अपील पर संबंधित ऑन-फील्ड अंपायर का एक्शन : अपने हाथों से टीवी स्क्रीन की फिगर बनाएंगे। इसके बाद थर्ड अंपायर से बात करेंगे कि वे अपना फैसला दें। साथ ही ये बताएंगे कि उनके आउट या नॉट आउट- किस फैसले पर किसने रिव्यू मांगा है।

क्या थर्ड अंपायर डीआरएस में किसी टेक्नोलॉजी की मदद ले सकते हैं : जी हां- रिप्ले, किसी भी तेजी से और किसी भी उपलब्ध कैमरे से, स्टंप माइक्रोफोन से रिकॉर्ड हुई आवाज, बॉल-ट्रैकिंग हॉकआई (हॉकआई इनोवेशन) तथा आवाज आधारित एज डिटेक्शन टेक्नोलॉजी। साथ में एलईडी विकेट से मिली लाइट और ज़िंग बेल्स और स्टंप। इसके अतिरिक्त अगर बीसीसीआई ने किसी और टेक्नोलॉजी का इंतजाम कराया है तो वह भी।

क्या डीआरएस का प्रयोग करने वाली आईपीएल पहली टी 20 लीग है : नहीं- इसका सबसे पहले पाकिस्तान सुपर लीग में इस्तेमाल हुआ (2017 सीज़न के प्ले-ऑफ राउंड में)।

ये तो हुई नियम की बात पर सवाल ये है कि इसकी जरूरत क्या थी? टी 20 में डीआरएस का उपयोग काफी नया है- 1 अक्टूबर 2017 से ही आईसीसी ने टी 20 इंटरनेशनल मैचों में डीआरएस को जरूरी कर दिया था। बड़े देशों में, भारत डीआरएस को अपनाने वाला सबसे आख़िरी देश था और सिर्फ 2016-17 में इंग्लैंड के विरुद्ध घरेलू टेस्ट सीरीज के दौरान ही इस सिस्टम का उपयोग किया था।

डीआरएस को आईपीएल में लागू करना जरूरी हो गया था क्योंकि गलतियां हो रही थीं और टी 20 में एक फैसले से बहुत फर्क पड़ता है। टी 20 में एक गलत फैसला मैच बदल सकता है। कई बड़े खिलाड़ी ऑन-फील्ड फैसलों से नाखुश थे और शिकायत कर रहे थे। इसकी जरूरत दर्शाने के लिए ही एमएस धोनी (तब राइजिंग पुणे सुपरजायंट के लिए खेल रहे थे) ने मुंबई इंडियंस के विरुद्ध एक मैच में रिव्यू का इशारा किया- ये जानते हुए भी कि डीआरएस है ही नहीं। इसे कोड ऑफ कंडक्ट तोड़ना माना गया पर जो वे कहना चाहते थे उसमें कामयाब रहे।

ख़ास तौर पर टूर्नामेंट के उससे पहले के दो सीजन (2016 और 2017) की ही बात करें तो कई अंपायरिंग गलतियां हुई थीं- एक सात गेंद का ओवर फिंक गया और एक गलत नो-बॉल कॉल (टॉम कुरेन) ने बड़ा तमाशा किया था। इसलिए डीआरएस की जरूरत महसूस हो रही थी।

डीआरएस का अंपायर सही इस्तेमाल करें- इसके लिए बीसीसीआई ने दिसंबर 2017 में दस भारतीय अंपायरों के लिए एक डीआरएस वर्कशॉप आयोजित की। इसका संचालन आईसीसी के अंपायरों के कोच डेनिस बर्न्स ने विजाग में किया। ऑस्ट्रेलिया से पॉल रीफेल भी आए थे। आईपीएल से पहले भी एक सेमिनार किया इसके बारे में। अंपायर इस बात से सहमत थे कि डीआरएस उन पर दबाव कम करेगा। खिलाड़ी अब शिकायत नहीं कर सकते कि फैसला उनके खिलाफ गया।

डीआरएस से आईपीएल में पहला विकेट कौन सा था : चेन्नई सुपर किंग्स के दीपक चाहर ने पारी के तीसरे ओवर में मुंबई इंडियंस के विस्फोटक ओपनर इविन लुईस को लेग-बिफोर आउट किया- वानखेड़े स्टेडियम में। लुईस ने अंपायर क्रिस गैफनी की ऑन-फील्ड कॉल पर रिव्यू की अपील की थी जिसका कोई फायदा नहीं हुआ।

ऐसा नहीं है कि डीआरएस के नियम के लागू होने के बाद कोई गलतियां नहीं हुईं फैसलों में- आईपीएल 2020 में मुंबई इंडियंस के किंग्स इलेवन पंजाब के विरुद्ध मैच में मोहम्मद शमी की गेंद पर कीरोन पोलार्ड को ग्राउंड अंपायर ने एलबीडब्ल्यू दिया। पोलार्ड ने डीआरएस लिया और बच गए। हुआ ये कि ग्राउंड अंपायर के आउट दिए जाने से पहले दोनों बल्लेबाजों ने जो एक रन लिया था- उसे अंपायर ने नहीं माना। इस पर बड़ा विवाद हुआ।

इसी तरह सनराइजर्स हैदराबाद-दिल्ली कैपिटल्स के बीच आईपीएल 2020 की भिड़ंत के दौरान ऑन-फील्ड अंपायर अनिल चौधरी ने कप्तान डेविड वार्नर को अपने इशारे से डीआरएस लेने से रोक दिया। वास्तव में हैदराबाद की इस से मदद हुई पर क्या अंपायर को ऐसी मदद करने का अधिकार था?

आईपीएल 2021 में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर ने रोमांचक मुकाबले में पंजाब किंग्स को 6 रन से हरा दिया- इस मैच में थर्ड अंपायर के एक डीआरएस कॉल ने विवाद खड़ा कर दिया। ओपनर देवदत्त पडिक्कल को बैंगलोर की पारी के दौरान रवि बिश्नोई की गेंद पर अंपायर ने आउट नहीं दिया तो पंजाब के कप्तान केएल राहुल ने डीआरएस का इस्तेमाल किया। थर्ड अंपायर ने पडिक्कल को ‘नॉट आउट’ घोषित किया हालांकि अल्ट्रा एज में साफ़ स्पाइक था।

फिर भी डीआरएस से गलतियों की गिनती कम हुई है।

Leave a comment

Cancel reply