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रिटायर क्रिकेटरों के लिए पहली पेंशन 5 हजार रुपये महीना थी 

बड़ी कीमत पर बिके आईपीएल मीडिया अधिकार का पैसा कहां-कहां और कैसे खर्च किया जाएगा? इस सवाल के जवाब में बोर्ड सेक्रेटरी जय शाह ने, जो लिस्ट गिनाई उसमें ये भी था कि इसका फायदा रिटायर हो चुके क्रिकेटरों और अंपायरों को भी मिलेगा। इसके कुछ ही घंटे बाद बीसीसीआई ने पुराने क्रिकेटरों (पुरुष और महिला दोनों) और अंपायरों की मासिक पेंशन में बढ़ोतरी की घोषणा कर दी। बोर्ड ने अच्छी बढ़त दी, इसलिए सब खुश। वैसे भी पुराने क्रिकेटरों को, जब बोर्ड कोई मदद नहीं दे रहा था तो भी वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। इसकी तुलना में पेंशन स्कीम के नाम पर अब बोर्ड कुछ दे ही रहा है।

वैसे बोर्ड ने आसानी से शुरू नहीं की थी ये पेंशन स्कीम। शुरू में बोर्ड के पास पैसा कहां था कि पुराने क्रिकेटरों की मदद करते? जो खेलते थे, उन्हें ही बड़ी कंजूसी से पैसा दिया जाता था तो पुराने क्रिकेटरों को कहां से पैसा देते? पैसा आना शुरू हुआ तो उसे बांटने के लिए दिल नहीं था। यहां तक कि जरूरतमंद खिलाड़ियों की भी मदद नहीं की बोर्ड ने।

ये सब चर्चा कोई नई नहीं थी पर जब पैसा होने के बावजूद मदद न देने के किस्से सामने आने लगे तो बोर्ड पर दबाव बना। उन्हीं दिनों की कुछ घटनाओं ने एकदम माहौल बदला। पुराने कप्तान जीएस रामचंद के इलाज में उम्मीद से ज्यादा पैसा खर्च हो रहा था तो उनकी पत्नी लीला रामचंद ने इलाज के लिए बोर्ड से मदद मांगी। उन्हें बिना देरी पैसा मिलना चाहिए था पर ऐसी मदद देने वाली कमेटी की मीटिंग न हो पाने की दलील पर इतनी देरी कर दी बोर्ड ने कि लगा उनकी पत्नी ‘भीख’ मांग रही हैं, जब तक बोर्ड ने सिर्फ 2 लाख रुपये मंजूर किए। इतनी देर कर दी कि कोई फायदा ही नहीं हुआ।

उधर कपिल देव ने अपने एक इंटरव्यू में, उनकी कप्तानी में खेली एक टीम इंडिया के मैनेजर और पुराने क्रिकेटर चंदू बोर्डे की हालत बयान कर दी। इतने बड़े और मशहूर क्रिकेटर चंदू बोर्डे पर जेब की हालत ये थी कि टीम मैनेजर की ड्यूटी से चार दिन की फुर्सत पर घर जाना था तो घर जाने के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में वे अपने डेली अलाउंस को लेने के लिए बोर्ड ट्रेजरर का चार घंटे इंतजार करते रहे। मुंबई-पुणे हाईवे पर एक टेस्ट क्रिकेटर के भिखारी की हालत में घूमने का किस्सा भी सामने आ गया। सलीम दुर्रानी और भगवत चंद्रशेखर की हालत भी पतली ही थी, जिन्होंने भविष्य की कोई तैयारी नहीं की थी, वे सब जूझ रहे थे।

इससे चारों तरफ से एक ही आवाज थी कि बोर्ड पुराने क्रिकेटरों की मदद करे। तब आखिरकार बोर्ड ने दिल खोला। पहली पेंशन स्कीम घोषित हुई रिटायर टेस्ट क्रिकेटरों और अंपायरों के लिए 28 अप्रैल 2004 को। फैसला लिया था जगमोहन डालमिया ने और पहली पेंशन थी 5000 रुपये महीना। स्कीम तो उसी महीने से लागू हो गई पर कई शर्त बड़ी अजीब थीं, जिन्हें बाद में बोर्ड ने धीरे-धीरे बदला। एक बड़ी ख़ास थी कि जब तक क्रिकेटर ज़िंदा तब तक पेंशन न विधवा को और न नॉमिनी को कोई मदद। इसका मतलब ये कि तब तक जिनका देहांत हो चुका था उन्हें बोर्ड की इस दरियादिली का कोई फायदा नहीं मिला। इसी तरह से हर टेस्ट खिलाड़ी इस स्कीम में बराबर था, चाहे कितने टेस्ट खेले हों। सिर्फ वन डे खेले और महिला क्रिकेटर भी तब पेंशन स्कीम में नहीं थे। फिर भी ये एक स्वागत योग्य कदम था और इसकी तारीफ़ हुई।

इस पेंशन स्कीम पर तारीफ बटोरने में बोर्ड ने कोई कंजूसी नहीं की और चैक 30 अप्रैल को देश के कुछ बड़े शहर में साथ-साथ बांटे। फंक्शन किया ज्यादा से ज्यादा पुराने खिलाड़ी खुद आएं, अपने चैक को लेने। बोर्ड ने इसे अपने प्लेटिनम जुबली के तोहफे से जोड़ दिया। हर ऐसे फंक्शन में बोर्ड की तारीफ़ करने वाले थे तो आलोचना करने वाले भी। एक बड़ी ख़ास बात ये थी कि किसी ने भी पेंशन स्कीम से पैसा लेने से इंकार नहीं किया, भले ही वे रिटायर होने के बाद, क्रिकेट में आए पैसे का पूरा फायदा उठा रहे थे। इनमें सुनील गावस्कर, रवि शास्त्री और कपिल देव का नाम खूब चर्चा में आया। मुंबई में फंक्शन वानखेड़े स्टेडियम में था और अगर वहां पॉली उमरीगर, जैसे सीनियर आए तो 82 साल के माधव मंत्री भी। तब इन्हें 5000 रुपये की भी सख्त जरूरत थी। रवि शास्त्री भी आए, चैक लिया और ये भी कह दिया, “मैं यहां सबका साथ देने आया हूं, न कि इस चैक के लिए।” हां, ये बात जरूर है कि तब शास्त्री ने ही वहां कहा था कि 1975 से पहले के खिलाड़ियों की हालत देखते हुए बोर्ड उनके लिए अलग से स्कीम बनाए और उन्हें एक मुश्त रकम दे। बोर्ड ने कई साल बाद, आखिरकार इस बात को माना।

2004 के बाद पेंशन स्कीम में समय-समय पर बदलाव होते रहे, कभी क्रिकेटरों को बोर्ड में आए पैसे का फायदा मिला तो कभी हालात का। मिसाल के लिए, जब नए-नए रिटायर होने वाले इंडियन क्रिकेट लीग की तरफ भाग रहे थे तो बोर्ड ने उन्हें रोकने के लिए अपनी पेंशन स्कीम को एकदम बड़ा आकर्षक बना दिया था। इन्ही, जैसे बदलाव के साथ 2022 तक पहुंचे।

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